अधूरे सपनों की उड़ान – अध्याय 8 | उम्मीद की किरण और नए संकल्प की प्रेरणादायक कहानी
अध्याय 8 – उम्मीद की किरण रात भर रामू को ठीक से नींद नहीं आई थी। बार-बार उसकी आँख खुल जाती और माँ के शब्द उसके कानों में गूंजने लगते। कल तक जो असफलता उसे डरा रही थी, आज वही उसे सोचने पर मजबूर कर रही थी। क्या वाकई असफलता अंत होती है, या फिर किसी नए रास्ते की शुरुआत? सुबह होने से पहले ही उसकी आँख खुल गई। घर के बाहर मुर्गे की बाँग सुनाई दे रही थी और गाँव अभी पूरी तरह जागा नहीं था। रामू चुपचाप चारपाई से उठा और बाहर आँगन में आकर बैठ गया। ठंडी मिट्टी पर बैठते ही उसे एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ। पूरब की ओर आसमान हल्का-हल्का उजाला पकड़ रहा था। अंधेरा अभी पूरी तरह गया नहीं था, लेकिन रोशनी आने का संकेत साफ दिखाई दे रहा था। रामू ने मन ही मन सोचा— “शायद ज़िंदगी भी ऐसी ही है, अंधेरे के बाद रोशनी धीरे-धीरे आती है।” उसने गहरी साँस ली। कल की तरह आज उसके मन में भारीपन नहीं था। डर था, लेकिन डर के साथ एक नई सोच भी जन्म ले रही थी। वह वापस कमरे में गया और अपनी किताबों को देखता रहा। वे किताबें, जिनसे कल उसे डर लग रहा था, आज वही उसे रास्ता दिखाती लग रही थीं। रामू ने एक किताब उठाई औ...