अध्याय 3 | गरीबी की दीवार अधूरे सपनों की उड़ान
अध्याय 3 : गरीबी की दीवार
हर सपना आसमान की ओर उड़ना चाहता है। हर सपना चाहता है कि उसे खुला आकाश मिले, जहाँ वह बिना किसी डर के अपने पंख फैला सके। लेकिन कुछ सपनों के सामने एक ऐसी दीवार खड़ी होती है, जो दिखाई तो नहीं देती, पर हर कदम पर महसूस होती है— गरीबी की दीवार।
रामू के जीवन में भी यह दीवार हर रोज़ उसके रास्ते में खड़ी रहती थी। यह दीवार ईंट-पत्थर की नहीं थी, बल्कि भूख, लाचारी, और मजबूरियों से बनी थी।
उस सुबह सूरज देर से नहीं निकला था, लेकिन रामू के घर में रोशनी देर से पहुँची।
पिता खेत से लौटे थे। उनके कपड़े पसीने से भीगे हुए थे, पैरों में थकान थी और चेहरे पर एक ऐसी चिंता, जो शब्दों में बयां नहीं होती।
माँ ने रसोई से झाँकते हुए धीरे से पूछा, “आज मज़दूरी मिली?”
पिता ने आँखें झुकाकर कहा, “काम कम था… सिर्फ़ सौ रुपये।”
कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा फैल गया। सौ रुपये— जिसमें घर का राशन, दवाइयाँ, बिजली का बिल और रामू की पढ़ाई— सब कुछ समेटना था।
रामू कोने में बैठा यह सब सुन रहा था। उसके हाथ में वही पुरानी किताब थी, जिसके पन्ने घिस चुके थे, लेकिन सवाल हर दिन नए होते जा रहे थे।
गरीबी का सबसे बड़ा दर्द यह नहीं होता कि जेब खाली है, बल्कि यह होता है कि सपनों को भी बार-बार तौला जाता है।
रामू ने हिम्मत जुटाकर कहा, “बाबूजी, अगर आप चाहें तो मैं शाम को किसी दुकान पर काम कर लूँ।”
पिता ने तुरंत उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में सख़्ती नहीं, बल्कि डर था— डर कि कहीं गरीबी उसके बेटे का बचपन और भविष्य दोनों न निगल जाए।
“नहीं बेटा,” पिता ने दृढ़ स्वर में कहा, “हम भूखे रह लेंगे, लेकिन तेरी पढ़ाई नहीं रुकेगी।”
माँ की आँखें भर आईं। वह जानती थी कि यह वाक्य कितनी बड़ी क़ुर्बानी माँगता है।
गरीबी सिर्फ़ पैसे की कमी नहीं होती। वह इंसान को हर दिन उसकी औक़ात याद दिलाती है। वह सपनों से पूछती है— “तुम्हारी कीमत कितनी है?”
गाँव में लोग बातें करते थे। कुछ सहानुभूति दिखाते, तो कुछ हँसते।
“गरीब का लड़का अफ़सर बनेगा?”
ये शब्द रामू के कानों में नहीं, सीधे दिल में चुभते थे। लेकिन हर ताना उसके भीतर एक नई आग जला देता था।
वह जानता था कि यह दीवार आसान नहीं है। यह दीवार किताबों से नहीं, संघर्ष से टूटेगी।
रात को जब पूरा गाँव सो जाता, रामू दीये की हल्की रोशनी में पढ़ाई करता। बाहर अँधेरा था, लेकिन उसके भीतर एक उजाला पल रहा था।
वह खुद से कहता— “अगर यह दीवार गिरा दी, तो आगे आसमान मेरा होगा।”
उस रात उसने फैसला कर लिया। गरीबी उसकी कहानी का अंत नहीं बनेगी, बल्कि शुरुआत बनेगी।
दीवार मोटी थी, लेकिन उसके हौसले उससे कहीं ज़्यादा।
📖 पिछले अध्याय पढ़ें:
👉 अध्याय 1 – अधूरे सपनों की शुरुआत
क्रमशः…
👉 अगला अध्याय: अध्याय 4 – खाली जेब और मजबूत इरादे






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